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10 महीने का वक्त प्लान के लिए था, तो क्यों कई देशों में गड़बड़ा गया वैक्सीनेशन?


दुनिया भर में 20 लाख से ज्यादा जानें लेने वाले कोरोनावायरस (कोरोना वायरस) ने पहले महामारी को लेकर तैयारियों की पोल खोली थी और अब टीकाकरण कार्यक्रम की तैयारी (टीकाकरण की तैयारी) की कमज़ोरियों को सामने लाकर रख दिया है। जिन देशों का दावा था कि वे महामारी से जूझने के लिए बेहतर तैयारी रखते हैं, वे भी कोविद -19 के सामने लाचार ही दिखते हैं। यहाँ तक कि विश्व स्वास्थ्य ऑर्गेनाइज़ेशन (WHO) तक इस आपत स्थिति में लड़खड़ा गया। खरबों डॉलर्स की अर्थव्यवस्था (विश्व अर्थव्यवस्था) तो चौपट हुई ही, बड़े और विकसित कहे जाने वाले देश एक वायरस के सामने घुटनों पर ही नज़र आई। यह सिलसिला जारी है और कई देशों में वैक्सीनेशन भी पटरी से उतर चुका है।

आप जानते हैं कि पहले वैक्सीन विकास को लेकर कई तरह की गड़बड़ियों की खबरें सामने आई थीं, फिर ट्रायलों को लेकर और वैक्सीनों के अप्रूवल पर भी सवाल उठे। अब कई देशों में उतावली में शुरू किए गए टीकाकरण कार्यक्रम और अभियान बुरी तरह फेल हुए हैं। अमेरिका से बात शुरू करते हैं और भारत तक की बात करेंगे, जहां समस्याएं वर्तमान में सबसे कम नज़र आ रही हैं।

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अमेरिका में बुरी तरह फेल हुआ वैक्सीनेशनन्यूज 18 ने आपको पहले विस्तार से बताया कि अमेरिका में टीकाकरण को लेकर कुछ भी गलत नहीं हुआ है। ट्रम्प प्रशासन की कोताही और अव्यवस्था के कारण न तो वैक्सीन निशान केंद्रों तक ठीक से पहुंची, न चुने गए समूहों को व्यवस्थित ढंग से दी जा सकी और आम लोग तो अब तक तरस ही रहे हैं। सप्लाई चेन से लेकर एक्शन फोर्स तक वैक्सीनेशन में नाकाम रही। राज्यों के बीच ठीक तरह से संवाद तक भी नहीं बने और अस्पष्ट गाइडलाइनों के चलते कई तरह के कन्फ्यूज़न खड़े हुए और लोग वैक्सीन के नाम पर सिर्फ गड़बड़ी ही देखते रहे।

न्यूज 18 क्रिएटिव

उपलाई की समस्याएं
वैक्सीन की सप्लाई चेन को लेकर बड़ी समस्याएं कई देशों में आईआईएन के सामने हैं। एक समाचार एजेंसी ने जो आंकड़े बताए, उनके अनुसार प्रति 100 लोगों के हिसाब से वैक्सीन डोज सबसे ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के मामले में इज़राइल सबसे आगे रहा, जहां 24.24 लोगों तक डोज़ पहुंच पाए। इसके बाद, यूएई में 15.50, बहरीन में 8.28 लोगों तक वैक्सीन पहुंची।

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बड़े और विकसित कहे जाने वाले देश इस तालिका में बुरी तरह पिछड़े हुए नज़र आए। यूके में हर 100 लोगों में से केवल 5.51, अमेरिका में 3.95, इटली में 1.66 और स्पेन में 1.65 लोगों तक केवल वैक्सीन पहुंचाई जा सकी। आपको बताया जा रहा है कि अमेरिका के अलावा यूरोप के इन देश भी को विभाजित -19 की चपेट में बुरी तरह से रहे हैं।

में बड़ी समस्या हो
वैक्सीन की सप्लाई प्रभावित होने से जो दूसरी सबसे बड़ी समस्या खड़ी हुई, वह प्रस्ताव की उपज बहुत धीमी हो गई है। पहले सप्लाई के हालात को समझें तो अमेरिका में यह बारे में जहां प्रशासन की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हुए तो इज़राइल में पर्सनलाइज़्ड और डिजिटाइज़्ड हेल्थ सिस्टम ने बाज़ी मारी। अमेरिका में जहां 2020 की गर्मियों में फाइज़र की वैक्सीन बुक करने की कवायद शुरू हुई थी लेकिन ऐन समय पर सप्लाई का संकट खड़ा हो गया, वहीं, इज़राइल ने प्राथमिकता से इस विषय को लेते हुए अपनी हैससिटी से ज़्यादा बजट भी इसे कम करके सुनिश्चित किया।

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अब प्राप्ति का मतलब है कि केंद्र तक वैक्सीन पहुंचे और उसे लोगों को लगाया जा सके। यहां भी इज़राइल ने निर्माण किया और लगभग 20 लाख लोगों को वैक्सीन दे दी जबकि यहां की कुल आबादी ही 90 लाख के करीब है। इसी तरह, यूएई और यूके में कुछ हद तक ऐसा ही सिलसिला दिखा, लेकिन ब्रिटेन में तैयारी में देर होना देखा गया। यह वास्तव में एक रेस में दौड़ने जैसा है। आप ऐसी समझें कि इज़राइल में लगभग 6 प्रतिशत आबादी महामारी की चपेट में आई जबकि ब्रिटेन में बीते शुक्रवार को ही 56000 नए मरीज़ सामने आए।

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प्रश्नों के कारण उत्पन्न हुई समस्याएं?
वैक्सीनेशन को लेकर जो समस्याएं पेश आ रही हैं, वे सरकार और प्रशासन की प्राथमिकताओं और नज़रें से जुड़ी हुई ज़्यादा हैं। हांगकांग यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डोनाल्ड लो के हवाले से खबरों में कहा गया कि पहला सवाल तो यही है कि किस देश में वैक्सीनेशन को लेकर सैद्धांतिक रूप से चर्चा करने का माहौल किस तरह बनाया गया है? यानी कहां किस तरह की तैयारी की गई कि किस समूह को पहले वैक्सीन दी जाएगी और उसके बाद में। साथ ही, यह भी किस तरह तय किया गया था कि उन समूहों तक सिलसिलेवार वैक्सीन पहुंचेगी कैसे। इस प्लानिंग में ही कई देश बैकोड हुए दिखे।

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इसके बाद डोज़ को समझने की बात आई। इस बारे में विशेषज्ञों ने कहा कि आपको प्लानिंग के तौर पर ही तय करना था कि कब वैक्सीनेशन शुरू होगा और किस तरह चलेगा। यानी उत्पादन क्षमता और उसके वितरण की रफ्तार के बारे में पहले ही सुनिश्चित हो जाना चाहिए था।

आखिर में यह भी एक सवाल खड़ा हो गया कि किन देशों ने अपने लोगों को वैक्सीन लेने के बारे में किस तरह से जागरूक किया? इस पहलू के साथ विशेषज्ञता का मामला सीधे तौर पर जुड़ गया। इसका मतलब इस तरह से समझना चाहिए कि इंडोनेशिया के प्रेसिडेंट टीवी पर आकर पता चलता है कि उन्होंने टीका लगाया, यह ज़रूरी नहीं था। ज़रूरी यह था कि आप वैक्सीन की टेस्टिंग, ट्रायल, साइड इफेक्ट्स और प्रक्रिया को लेकर वैज्ञानिक आधार बताते हैं और लोगों के मन में एक संतुष्टि पैदा करनी थी।

यह भी कहा गया है कि हांगकांग में लोग सरकार पर विश्वास नहीं कर पाए और वैक्सीन लेने में बिदक गए। अब रही बात भारत की, तो अब तक वैक्सीनेशन कार्यक्रम की चर्चा उन देशों के सिलसिले में की गई, जहां टीकाकरण शुरू होने के समय हो चुका है और विश्लेषण करने लायक आंकड़े और स्थितियां सामने आ चुकी हैं।

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भारत में टीकाकरण कितना सफल?
देश में वैक्सीनेशन शुरू हुआ अभी एक हफ्ता भी नहीं हुआ है और लक्ष्य तय करके वैक्सीन दिए जाने की कवायद जारी है। कुछ समस्याओं के बीच जो सामने आई हैं, उनमें से प्रमुख रूप से प्रबंधन और तकनीक संबंधी हैं। जैसे टीकाकरण अभियान जिसे कोविन एप पर रखती है, कुछ मामलों में उस पर पंजीकरण और ठीक सूचना न मिल पाने की शिकायतें रहीं। दूसरे, कोवैक्सिन के मामले में पारदर्शी आंकड़ों के न होने से वैक्सीन लेने के प्रति एक नकारात्मक लहर भी देखी गई।

उनके अलावा, वैक्सीन दिए जाने के बाद कुछ मौतों के मामले में कहा जा रहा है कि मौत का कारण वैक्सीन नहीं हो रहा है। सप्लाई और आवेदन को लेकर वर्तमान में टीकाकरण अभियान में बड़ी समस्याएं आ रही हैं। कुछ खबरों में यह भी कहा गया है कि पूरे कार्यक्रम के दौरान शिकायत शिकायतें ही आ रही हैं, बड़ी समस्याएं नहीं हैं।



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