Home Health स्वागत है 2021: संभावना हमेशा जिंदा है

स्वागत है 2021: संभावना हमेशा जिंदा है


नया साल शुरू होने के लगभग एक हफ्ता हो गया है। 2020 ऐसा साल था जो हर इंसान के जीवन जीने का तख़्त ही बदल गया। गया साल हालत कुछ यूं था कि लगता था जैसे यह साल कभी ख़त्म ही नहीं होगा। एक ऐसा समय जब सारी दुनिया ही थम गई थी। बड़े-बड़े उद्योग से लेकर छोटी सी टपरी भी खाली सड़कों पर नज़र गड़े चहल-पहल के पुनर्जीवित होने की राह ताक रहे थे। जैसा कि हमेशा से कहा जाता है – ‘यह वक़्त भी गुज़र जाएगा।’ और वह वक़्त भी गुज़र गया। महीनों अपने घरों में डरकर बैठे लोग नई ऊर्जा से अपने कदम संभालते हुए फिर से जीवन की ओर लौट आए।

गया साल न सिर्फ जीवन रुक जाने की वजह से विचलित कर देने वाला था बल्कि इसलिए भी कि हमारे कई चहेते कार्यकर्ता भी इस दुनिया को छोड़ कर चले गए। वे कलाकार न सिर्फ स्क्रीन पर अपनी कला की छाप छोड़ गए थे बल्कि उनके चाहने वालों के दिलों में इस कदर बसते थे जैसे उनका कोई अपना छोड़ कर चला गया हो। हर किसी का मन भारी था। उसी बीच कई लोगों को अपनी नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा। ऐसे कठिन समय में संभल पाना सभी के लिए मुश्किल था। जीवन के सभी आदर्श, ज्ञान और धैर्य की परीक्षा चरम पर थी। जहां एक ओर प्रकृति हमें खिली-खिली सी दिखती थी वहीं हमारा अपना जीवन दुखों से भरा हुआ नज़र आने लगा था। कई लोग अपनों से दूर कहीं किसी शहर में फंसे हुए थे तो कुछ लोग अपने घरों में अपनों के साथ को अपना अच्छा भाग्य मान रहे थे। कहने का तात्पर्य कि चारों ओर सन्नाटा होने के बावजूद अफरा-तफरी मची हुई थी।

लेकिन कुछ ही महीनों में हम सभी ने जीवन की शुरुआत की। लोगों ने आमदनी के नए विकल्प के लिए निषाद के लिए। नए जीवन की ओर बढ़ते हुए कदम डायमे ही सही, लेकिन प्रागढ़ थे। दुनिया की हर संस्कृति में त्योहारों का विशेष महत्व है। यह हमेशा से ही हमें अपने दुखों से ऊपर उठता है, जीवन का उत्सव मनाने की प्रेरणा देते हैं। त्योहारों की शुरुआत में ही लोगों के जीवन के प्रति उत्साह बढ़ता है। लगा कि जैसे ‘अभी मुझमें कहीं बाकी थोड़ी सी है ज़िन्दगी।’ और इसी तरह लोगों की उदासी भरे बादल छटने लगे। लोग पुनः आपस में, एहतियात बरतते हुए ही सही लेकिन फिर से लगे हुए हैं। कई लोग जो एक दिन भी बिना एक दूसरे से मिले बगैर नहीं काटते थे, वे महीनों बाद दोबारा मिलने लगे। लोगों की आँखों में ख़ुशी के आंसू बहने लगे थे।

क्या वाक़ई 2020 इतना बुरा साल था? हम अक्सर अपनी रोज़मर्रा की चीज़ों में उन चीज़ों को ‘के लिए ग्रांटेड’ ले लेते हैं जो हमारे ज़िन्दगी के कैनवास पर रंग भरती हैं। शायद 2020 इसी बात का एहसास दिलाने आया था। आपके दोस्त, रिश्तेदार, सामाजिक सरोकार आदि जीवन के अंग होते हुए भी अपनी महता खोते जा रहे थे। गुज़रे साल के लोगों के बीच आई दूरियाँ उनके रिश्तों के साथ लाने में मददगार हुईं। कई लोगों ने घर में सोशल मीडिया के ज़रूरी नए लोगों से संबंध बनाए। नए-नए दोस्त बनाए और जिन लोगों से वह वक़्त न मिलने का बहाना बना कर बात करने में गुरेज़ करते थे, उनसे मिलने के लिए नए तरीके पढ़ते हुए लगे। देखा जाए तो गुज़रा साल व्यक्तिगत विकास का साल था। हर किसी ने कुछ न कुछ नया सीखा है। ज़रा सोच सोच आप जो इंसान आज हैं वह कभी न होते अगर आपकी ज़िन्दगी वही घिसे पिटे ढेर्रे पर चलती रहती है। इस साल कुछ नहीं तो गोपाल दास नीरज की इन पंक्तियों को तो सार्थक कर ही दिया, ‘कुछ सपनों के मर जाने से जीवन नहीं मरा करता है।’

बेशक, एक बड़े तजुर्बे की तरह जब उसने आहट दी। हम काँपे-थर्रा। बदहवासी ने हमें घेरा लेकिन जीवन रुका नहीं। तमाम बैचों को सहलाता हुआ उम्मीद की उंगली थामकर वह आगे बढ़ रही है। गुलज़ार कहते हैं कि ‘आदमी धोने में पानी का / पानी की बहती सतह पर टूटता भी है, डूबता भी है / फिर उबरता हैं / फिर से बहता है / न समंदर पत्थर हो उसको / न तारीख़ तोड़ पाया है उसे “जब मौज पर” पुण्य बहता / आदमी धोने का पानी का है। ‘

किसी निबंध का लिखा याद आता है कि व्यक्ति अपने समय में जीता है। Inn को भरपूर खेलता है। खेल चलता रहता है। समय की झंकार सुनाई नहीं जाती। लेकिन वह बराबर पहरा रहता है। खबरदार करता रहता है। सावधान करता है। आदमी न चेते, वह अलग बात है। ललित निबंधकार श्रीराम परिहार के शब्दों में- यह हुआ समय वस्तुओं के दर्पण के बारे में है। कम यह है कि उन दर्पणों में समय अपना मुँह नहीं देख रहा है। मुंह देखने की और प्रतिबिंब को पकड़ने की बीमार होड़ आदमी में लगी है। आदमी दूसरे के पांव के शिशु पर लात मारकर आगे बढ़ना चाह रहा है। प्रकृति के संसाधनों का रूपांतरण इतना चमत्कारी ढंग से हुआ कि हमारी दुनिया भर गई। । आदमी खाली हो गया। उसके पास मूल्य नहीं है तो उसकी कोई कीमत नहीं है। वही न होगा, तो सारी बातें धरी रहेंगी।

आदमी और समय के समीकरण किताबों में भले ही हल होते हों, जीवन में उनके समाधान कुछ और ही होते हैं। समय ही आगे रहता है, पर आदमी की ताक़त और अहमियत है कि उसी के कारण वह हाइलाइट होता है। जल्द पारित हो जाता है और कुछ जीवित मार्करीकरण और संस्कृति के मूल्यों में हाथ लगते हैं। आखिअर हम क्या चाहते हैं! नया साल इसी सवालनाकुलता के बीच दस्तक दे रहा है।कहते हैं रात का अंधेरा सबसे गहरा सूरज उदय होने के ठीक पहले ही होता है। इस गहरी रात के बाद 2021 का सूरज अपने साथ धीरे-धीरे ही सही कुछ उजाला तो ज़रूर लाएगा। जापान के हिरोशिमा-नागासाकी में हुई दुर्घटना के बाद जापान ने इस कदर दुनिया के नक़्शे पर प्रकट किया कि आज न सिर्फ वह अपने पैरों पर खड़ा है बल्कि वह दुनिया में विकास की परिभाषा बन गई है। शायद यही हमारे लिए वह मौका है जब हम एक कदम पीछे होने वाले दो कदम आगे बढ़ेंगे। पिछले महीने भले ही कितने बुरे हो गए लेकिन उन्होंने निश्चित रूप से हमें आपातकालीन परिस्थितियों का दृढ़ता से सामना करना ज़रूर सिखाया है। कुछ भी हो, जब तक उम्मीद ज़िंदा है तब तक खेल में हार नहीं होती। विपरीत परिस्थितियों में साल गुज़ारने के बावजूद 2021 का स्वागत जिस प्रेम से दुनिया भर ने किया है, वह देख कर निश्चय ही लगता है कि उम्मीद अब भी ज़िंदा है, खेल अब भी बरकरार है।

इसी उम्मीद से ज़िन्दगी को शायर निदा फ़ाज़ली कुछ इस तरह कहते हैं-
वही है ज़िंदा / गरजते बादल / सुलगते सूरज / छलकती नदियों के साथ है जो / खुद अपने क़लमों की धूप है जो / खुद अपनी आँखों की रात है जो।
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं।)

ब्लगर के बारे में

विभोर उपाध्यायलेखक, रिपोर्टर

बदलते संदर्भों, विषयों और वैचारिक मुद्दों पर नई सोच का लेखन। कंटेंट रिहर्स के रूप में कई उपक्रमों के साथ काम करते हैं। युवा वकील।

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