HomeHealthशायरी: लाज़िम नहीं हर शख़्स ही अच्छी मुझे समझे, पढ़िए रसा शिग़ुलते...

शायरी: लाज़िम नहीं हर शख़्स ही अच्छी मुझे समझे, पढ़िए रसा शिग़ुलते की शायरी- News18 Hindi


रसा चुगलते की शायरी (रस चुगताई शायरी): रसा चुगाते हुए एक नामचीन शायर थे जिनका नाम किसी तरुफ़ का मोहताज नहीं था। रसा चुगाते को कई लोग रसा कहकर भी बुलाते थे। रसा चुगलेट का मूल नाम मिर्ज़ा मुहताशिम अली बेग था। रसा चुगाते का जन्म जयपुर राजस्थान में हुआ था। हालांकि बाद में वे पाकिस्तान की राजधानी कराची में बस गए थे। रसा चुगाते की शायरी में प्यार, इंतजार और कशिश बखूबी देखने को मिलती है। आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर पेश हुए हैं रसा चुगाते की शायरी …

1 है। तेरा आना का इंतिज़ार होना

उम्र भर मौसम-ए-बहार रहा

पा-ब-ज़ंजीर ज़ुल्फ़-ए-यार हो रही है

दिल असीर-ए-ख़याल-ए-यार रहा

धूप अपने ग़मों की धूप पाने से

सा इक सर्व-ए-साया-दार रहा

मैं परेशान-हाल आशुफ़्ता

सूरत-ए-रंग-ए-रोज़गार रहा

आइना आइना फिर भी

लाख पास-ए-गुबार रहा

जब हवा ते-ए-कमंद आईं

जब निगाहों पे इख़्तियार रहा

तुज़ से मिलने को बे-क़रार दिल था

तज से मिल कर भी बे-क़रार रहा।

यह भी पढ़ें: शायरी: आग़ाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया, इस्माइल मेरठी की शायरी

२। तिरे दृदीक आ कर सोचता हूँ

मैं ज़िंदा था कि अब ज़िंदा हुआ हूँ

जिन आँखों से मुझे तुम देखते हो

मैं उन आंखों से दुनिया देखता हूं

ख़ुदा जाने मिरी गठरी में क्या है

न जाने क्यूँ उठाया फिर रहा हूँ

ये कोई और ऐ ऐक्स-ए-दरिया है

मैं अपने अक्स को पहचानता हूँ

न आदम है न आदम-ज़ाद नं

किन ध्वनियों से सर टकरा रहा हूँ

मुझे इस भीड़ में ऐसा लगता है

कि मैं ख़ुद से बिछड़ के रह गया हूँ

जिसे शायद किसी ने नहीं समझा

मैं अपने अहद का वो सानेहा हूँ

न जाने क्यूँ ये साँसें चल रही हैं

मैं अपनी जिन्दगी तो जी चुका हूँ

जहां मौज-ए-हवादीस चाहे ले जाए

ख़ुदा हूँ मैं न कोई नाख़ुदा हूँ

जुनूँ कैसे कहाँ का इश्क़ साहब

मैं अपने आप ही में मुब्तिला हूँ

नहीं कुछ दोश उस में आसमाँ का

मैं ख़ुद ही अपनी नज़रों से गिरा हूँ

तरारे भर रहा है वक़्त या रब

कि मैं ही नेतृत्व कर रहा हूँ रुक गया हूँ

वह पहरों आईना क्यूँ देखता है

लेकिन ये बात मैं क्यूँ सोचता हूँ

अगर ये महफ़िल-ए-बिंत-ए-इनब है

तो मैं ऐसा कहाँ का पारसा हूँ

ग़म-ए-अंदेशे-हा-ए-ज़िंदगी क्या

तपिश से आगही की जल रही हूँ

अभी ये भी कहाँ जाना है कि ‘मिर्ज़ा’

मैं क्या हूँ कौन हूँ क्या कर रहा हूँ।

३। मुमकिन है वो दिन आया कि दुनिया मुझे समझे

लाज़िम नहीं हर शख़्स ही मुझे अच्छी समझे

कोई भी शहर में ऐसा नहीं है जिसे मैं

अपना न कहना और वो अपना मुझे समझे

हर-चंद मिरे साथ अहल-ए-बसीरत

कुछ अहल-ए-बसीरत थे कि तन्हा मुझे समझे

मैं आज सर-ए-आतिश-ए-नमरूद पैदा हूँ

अब देखिए ये ख़ल्क़-ए-ख़ुदा मुझे क्या समझे।



LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read