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शायरी: ‘दरमियाँ के फ़ासले का तय सफ़र कैसे करें’, मुहब्बत से लबरेज़ शायरी


शायरी: उर्दू शायरी जज्जीबातों की दुनिया है। इसमें हर जज्जीबत को क़लमबंद किया गया है। शायरी में जहाँ मुहब्बीत, दर्द से लबरेज़ जज्बीबात को जगह मिली है, वहीं इंसानी ज़िंदगी के दूसरे पहलुओं को भी ख़ूबसूरत के साथ जगह दी गई है। यदि दोस्ती का जिक्र है, तो दुश्मनी के जतन को को भी अलग ही अंदाज़ में पेश किया गया है। एक तरह से कहें तो शायरी दिल से निकली आह है, चाह रही है और सद् है, जिसे हर शायर ने अपने जुदा अंदाज़ में पेश किया है। आज हम शायरों के ऐसे ही निश्चित’तीमती कलाम से चंद अशआर आपके लिए भारत में हुए हैं। आज की इस कड़ी में पेश हैं ‘फ़ासला’ पर शायरों का नज़रिया और उनकी कलाम के चंद रंग। आप भी इसके लुद्रफ़ उठाइए।

बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखते हैं
जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता
बशीर बड़फ़ासले ऐसे भी होंगे ये कभी सोचा न था
सामने बैठा था मेरा और वो मेरा न था

अदीम हाशमी

कोई हाथ भी न मिला होगा जो गले मिलोगे तपक से
ये नए मिज़ाज का शहर ज़रा फ़ासले से मिला है
बशीर बड़

क़ुर्बतें लाख ख़ूबसूरत हों
दूरियों में भी दिलकशी अभी है
अहमद फ़राज़

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भला हम मिले भी तो क्या मिले वही दूरियां वही फासले
न कभी हमारे क़दम बढ़े न कभी आपकी झिझक गई
बशीर बड़

फ़ासला दर्शकों का धोका भी हो सकता है
वह मिले या न मिले हाथ बढ़ा कर देखो
निदा फ़सली

दुनिया तो चाहती है कि यूं ही फ़ासले रहो
दुनिया के मश्वरों पे न होने के नाते वह जा रही थी
हबीब ट्रेब

मसअला ये है कि उस के दिल में घर कैसे करें
दरमियां के फ़ासले का फिक् सफ़र कैसे करें
फ़र्रुख़ जाफ़री

उसे ख़बर है कि अंजाम-ए-व्लस क्या होगा
वह क़ुर्बित्स की तपिश फ़ासले में रखता है
ख़ालिद यूसुफ

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कितने शिकवे गिले हैं पहले
राह में फासले पहले ही हैं
फ़ारिग़ बुख़ारी (साभार / रेखाचित्र)



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