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शायरी: आग़ाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया, इस्माइल मेरठी की शायरी- News18 हिंदी


इस्माइल मेरठी की शायरी (इस्माइल मेरठी शायरी): इस्माइल मेरठी का नाम शेर और शायरी की दुनिया में किसी तर्रुफ़ का मोहताज़ नहीं है। इस्माइल मेरठी का असली नाम मोहम्मद इस्माइल था। इस्माइल मेरठी को उनकी बेहतरीन शायरी और नज्मों के लिए नई नज़्म के निर्माता कहा गया। इस्माईल मेरठी को शुरू में शायरी से पसंद नहीं था लेकिन समकालीनों विशेष रूप से क़ल्क़ की संगत ने उन्हें शे’र, गज़ल और नज़्म में अपना हुनर ​​आजमाया और नाम कमाया। आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर आए हैं इस्माइल मेरठी की शायरी और नज्में …

1 है। मैं अगर वो हूँ जो होना चाहिए

मैं ही मैं हूँ फिर मुझे क्या चाहिए

ग़रक़-ए-ख़ुम होना मयस्सर हो तो बस

चाहिए साग़र न मीना चाहिए

मुनहसिर मरने पे है फ़तह-ओ-शिकस्त

खेल मर्दाना खेला जाना चाहिए

बे-तिल्लुफ़ फिर तो खेवा पार है

मौजजान क़तरा में दरिया चाहिए

शिक ग़ैरों पर न कर तेग़ल-ओ-तबर

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आपको अपने से मुबर्रा को चाहिए

हो दम-ए-अर्ज़-ए-तजल्ली पाश

सीना मिस्ल-ए-तूर-ए-सीना चाहिए

हुस्न की क्या इब्तिदा क्या इंसा

शेफ़्ता भी बे-सर-ओ-पा चाहिए

पारसा बन गर नहीं रिंदों में बार

कुछ तो बेकारी में करना चाहिए

कुफ़्र में साक़ी पे ख़िस्सत का गुमाँ है

तिश्ना सरगम-ए-तक़ाज़ा चाहिए।

२। आग़ाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया

नाकामियों के ग़म में मिरा काम हो गया

आप रोज़-ओ-शब जो दस्त-ब-ए-अदू फिरे

मैं संस्थापक-ए-गर्दिश-ए-अय्यम हो गया

मेरा निशानाँ मिटा तो हटाओ ये रस्क है

विर्द-ए-ज़बान-ए-ख़ल्क़ तिरा नाम हो गया

दिल चाक चाक नग़्मा-ए-निक़ूस ने किया

सब पारा पारा जामा-ए-एहराम हो गया

अब और भाषिकिए कोई जौलाँ-ते-ए-जुनूँ

सहरा बी-क़द्र-ए-वुसअत-यक-गम हो गया

दिल पेंच से न तुर्रा-ए-सूर-ख़म के रुक गए

बाल-रवी से मुर्ग़ ता-ए-दाम हो गए

और अपने हक़ में ताम-ए-तग़ाफ़ुल ग़ज़ब हुआ

ग़ैरों से मुल्तफ़ित बुत-ए-ख़ुद-काम हो गया

तासीर-ए-जज़्बा क्या हो कि दिल इज़्तिराब में

तस्कीं-पज़ीर बोसा-ब-पैग़ाम हो गया

क्या अब भी मुझे पे फ़र्ज़ नहीं दोस्ती-ए-कुफ़्र

वो ज़िद से मेरे दुश्मन-ए-इस्लाम हो गए

अल्लाह-रे बोसा-ए-लब-ए-मय-गूँ की आरज़ू

मैं ख़ाक हो के डरद-ए-तह-ए-जाम हो गया हूँ

अब तक भी नज़र तरफ़-ए-बाम-ए-माह-वश है

मैं गरचे आफ़्ताब-ए-लब-ए-बाम हो गया

अब हर्फ़-ए-ना-सज़ा में भी उन को दरेग़ है

क्यूँ मुझे को ज़ौक़-ए-लजज़त-ए-नाम हो गया।

३। ऐसा क्या हो गया कि तुझे देखती नहीं

जी चाहता है आग लगा दूँ नज़र को मैं।



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