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वो स्टेनोग्राफर, जो नहीं होता तो खो जाते स्वामी विवेकानंद के यादगार भाषण


जब 1893 में स्वामी विवेकानंद अमेरिका के ऐतिहासिक दौरे (स्वामी विवेकानंद के अमेरिकी दौरे) पर गए थे, तब वहां उन्हें शिकागो धर्म सम्मेलन (शिकागो धर्म संसद) के बाद कई स्थानों पर लेक्चर देने थे। विवेकानंद के अनुयायियों की इच्छा थी कि कोई स्टेनोग्राफर लेक्चर्स को रिकॉर्ड कर सके। समस्या यह थी कि विवेकानंद जिस प्रवाह के साथ बोलते थे, उस ऊपर से रिकॉर्ड कर पाने वाला जोन्सो मिल नहीं रहा था। विवेकानंद के दोस्तों ने कोर्ट में रिपोर्टर जे। जे। गुडविन (जॉन जोशिया गुडविन) को यह ज़िंदा सूची सौंपी। हालाँकि वो कब गुडविन बहुत महंगे हुए थे, लेकिन अब इतिहास है कि गुडविन नहीं होते तो विवेकानंद के बोले हुए ज़्यादातर शब्द खो गए होते हैं।

गुडविन एक बार विवेकानंद से क्या जुड़ा, वे हमेशा के लिए बंधकर बने रहे। सिर्फ अमेरिका ही नहीं, उसके बाद विवेकानंद दुनिया में जहां भी गए, गुडविन उनके साथ बने रहे। भारत के ऊटी को आखिर गुडविन ने अपना घर बनाया, जिसकी 150 वीं जयंती बीती 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद जयंती के साथ ही मनाई गई। हालांकि उनका जन्मतिथि 20 सितंबर है, लेकिन कोरोना के मुताबिक पिछले साल इसे रामकृष्ण मठ नहीं मनाया गया था। विवेकानंद के लेक्चरों को नोट करने और उन्हें टाइप कर सुरक्षित रखना व अखबारों को प्रेषित गुडविन का जीवन बेहद महत्वपूर्ण रहा।

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गुडविन कैसे विवेकानंद से जुड़े?न्यूयॉर्क के अखबारों में 25 साल के गुडविन ने विज्ञापन देखा था कि वेदांत सोसायटी विवेकानंद के लेक्चर्स को नोट करने के लिए एक स्टेनोग्राफर चाहते थे। जॉन जोसिया गुडविन को यह कला अपने पिता जोसिया से विरासत में मिली थी और वह रिकॉर्ड से टाइप कर सकते थे। इस विज्ञापन के ज़रूरी न्यायालय में पत्रकार के तौर पर काम कर रहे गुडवि स्वामी विवेकानंद के संपर्क में आए।

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प्रारंभ में विवेकानंद के लेक्चरों को नोट और टाइप करके अखबारों और कल यानी उस समय के कलकत्ता से छिंग वाली पत्रिका ब्रह्मवादी तक भेजना गु डविन का काम था। इसके बाद अगले दो से ढाई साल तक गुडविन बराबर विवेकानंद के साथ बने रहे।

स्वामी विवेकानंद को समर्पित पोर्टल vivekananda.net

गुडविन का भारत आना और गुशना
1897 में स्वामी विवेकानंद दुनिया के कई हिस्सों में भ्रमण के बाद भारत पहुंचे थे। कई अनुयायियों के साथ गुडविन भी उनके साथ मद्रास पहुंचे थे। कुछ समय उत्तर भारत में विवेकानंद के साथ घूमने के बाद मद्रास लौटकर गर्मी से परेशान हो गए गुडविन ने ऊटी रे रहना ठीक समझा। बताते हैं कि जनवरी 1898 के बाद गुडविन और विवेकानंद की प्रस्तुति कभी नहीं सकी।

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मद्रास की गर्मी न झेल पाए गुडविन की सेहत ओटी जा भी नहीं संभाली। बीमार रहते हुए उन्होंने 2 जून 1898 को सिर्फ 27 साल की उम्र में दम तोड़ दिया था। उनकी मौत पर विवेकानंद ने इस तरह के शब्द कहे थे:

उसका ऋण मुझे कभी नहीं होगा। अगर किसी को ऐसा लगता है कि मेरे किसी शब्द से उसे कोई मदद नहीं मिली है, तो मैं दूं कि उसके पीछे गुडविन की अनथक और निस्वार्थ मेहनत ही रही। मैंने ऐसा एक दोस्त खो दिया जो स्टील की तरह मज़बूत, पूरी तरह समर्पित और थकान शब्द को ही न जानने वाला था … दुनिया में ऐसे महान लोग कम हैं जो दूसरों के लिए ही जीते हैं।

गुडविन उर्फ ​​बैदविन और विवेकानंद की यात्रा
चूंकि गुडविन को क्रिकेट और फुटबॉल के साथ जुआ खेलना भी पसंद था इसलिए मज़ाक में विवेकानंद उन्हें बैडविन भी कहते थे। दोनों के बीच अच्छा मित्रान संबंध रहा लेकिन गुडविन काप्रिंटन कभी कम नहीं रहा। शिकागो की धर्म संसद के बाद विवेकानंद को पूरे अमेरिका का दौरा कर कई जगह लेक्चर देने थे। 1895 में गुडविनिनो के तौर पर उनके दौरे में शामिल हुए और पूरे अमेरिका में विवेकानंद के लेक्चर रिकॉर्ड रहे।

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न्यूज 18 क्रिएटिव

अमेरिकी लेखक और विवेकानंद की प्रसिद्ध अनुयायी सारा बुल ने गुडविन को विवेकानंद का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी बताया था। अमेरिका के बाद 1896 में विवेकानंद के इंग्लैंड के दौरे पर भी गुडविन के साथ रहा। आखिर में भारत पहुंचे वे गु डविन ही थे, जो दुनिया को यह रिपोर्ट दी थी कि भारत में कितने उत्साह के साथ विवेकानंद का स्वागत किया गया था।

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विवेकानंद जब कलकत्ता पहुंचे थे तब बंगाली के प्रसिद्ध लेखक शरतचंद्र ने भी उनसे मुलाकात की थी। बाद में शरतचंद्र ने जब ‘एक अनुयायी की दी’ लिखी तो उसमें उन्होंने भी गुडविन का ज़िक्र किया। 1897 में कम्मो से अल्मोड़ा तक विवेकानंद के लेक्चर्स को लघु सप्ताह रिकॉर्ड करते हुए गुडविन मद्रास पहुंचकर ब्रह्मचारी बन गए थे।



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