Home Health वेब सीरीज 'तांडव' का फिर से रिलीज रिव्यू और विरोध की जमीनें...

वेब सीरीज ‘तांडव’ का फिर से रिलीज रिव्यू और विरोध की जमीनें चलती हैं


तांडव एक ऐसी वेब श्रृंखला है (तंदव वेब श्रृंखला) जिसे आप नहीं देखेंगे तो कुछ भी मिस नहीं करेंगे। ऐसा कुछ नहीं है कि इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की जाए। लेकिन इसमें ऐसा बहुत कुछ है जिस पर आप भड़कने का मन बना लें तो अच्छा खासा भड़क और तुनक सकते हैं। इसे बैन किए जाने के कई ‘पॉपुलर कारण’ भी मौजूद हैं जिनके कारण ऐमजॉन प्राइम (अमेज़ॅन प्राइम) और फिल्म का विरोध हो रहा है। इतिहास गवाह रहा है कि कई बार विवादों ने औसत फिल्मों को भी लोकप्रियता के अच्छे खासे मुकाम तक पहुंचाया है और अच्छी फिल्मों की मिट्टी पलीत कर दी है। ऐसे में इसका क्या होने वाला है … यह कुछ दिनों में पता चल जाएगा। इसके बावजूद, यह भावनात्मक रूप से देख रहा है (या किसी अन्य स्तर पर) नुकसानदायक तो नहीं ही है।

वैसे निजी स्तर पर, मैं हर फिल्म को देखने योग्य मानती हूं। वह इसलिए क्योंकि फिल्में समाज का आईना होती हैं। हम कभी कभी आईने को समाज का हिस्सा न समझकर पूरा का पूरा समाज समझने लगते हैं, इसलिए फैल जाते हैं। वह समाज के एक समय विशेष, एक पक्ष विशेष, एक समस्या, एक बीमारी विशेष और एक एंगल विशेष की ओर संकेत करती हुई हो सकती है, लेकिन फिल्में लाती अपना कच्चा माल समाज के भीतर से ही हैं। हम सहमत हों या न हों।

शीशे में चेहरे पर मुनसे और दाग धब्बे दिख रहे हैं तो वह इसलिए, क्योंकि शीशे के बाहर खड़े आदमी के मुंह पर सचमुच मुनसे हैं और चेचक के गहरे गढ्डे हैं। हां, अगर यह आदमी मेक फाउंडेशन और कंसीलर लगाकर शीशे के सामने खड़ा होता है, तो शीशा चमकदार दिखाती है। कई फिल्में इस बात का ख्याल रखती हैं … डेंटिंग-पेंटिंग के साथ पेश होती हैं। कई फिल्में जैसी हैं, वैसा ही दिखना चाहती हैं। इसमें थोड़ा बहुत तियां पाँचा करती भी हैं तो वह शक्ल को कुछ और विद्रूप बना बैठती हैं, और फिर उलटा फंस जाती हैं। कई फिल्में सेफ पेसेज लेती हैं और कुली नंबर वन सरीखी बनकर उतरती हैं। तुम उन्हें देखकर महाबोर भी हो जाओ तो भी उनकी कनपटी गरम करने की नहीं सोचती। ये फिल्में ऐरा बनकर पेड़ा कमा लेती.तांडव पर बात तो ऐसा होना चाहिए कि सीजन फर्स्ट में जेएनयू के गुजरे जमाने के विवादों से कथित रूप से ‘इंड ’तक स्टोरी में बड़ा हिस्सा पेश किया तो गया लेकिन बहुत बेकार तरीके से। कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा अगर पहले सीजन में ही है तो दूसरे सीजन में तो हिन्दुस्तानी वेब सीरीज की तरह भी सकपकाई रहती है। ये बिल्कुल ऐसा ही होता है कि बड़ी बेटी गोरी, लंबी और खेल में तेज हो तो छोटी सांवली, पढ़ाई में अव्वल बेटी अपेक्षाओं और लानतों के बोझ तले दबकर जो था वह भी नहीं रहता और जो हो सकता था, वो भी नहीं रहीं पाती।

पहले ही चरण में हिंदू हिंदू देवताओं को लेकर किया गया था। हाल के इंटरनेट विवादों और धर्म को लेकर राजनीतिक उफानों को मजाकिया लहजे में यूं न भी दिखाते तो चलता है लेकिन फिर यह लेखकीय स्वतंत्रता है। ऊंट किसी न किसी ओर तो करवट ही लेता है। आर्टिकल 15 जैसी शानदार फिल्मों में गौरव सोलंकी की कविताओं और लेखन दोनों ही तीखा और नंगा होता है। आप पसंद करें न करें लेकिन सच्चा। इस फिल्म के लेखन में भी यह दिखाई दिया है। फिल्म का डायरेक्शन और एक्टिंग बेहद कमजोर होने के कारण सबकुछ तरा ठहरना सा है और यह भी एक कारण है कि हिन्दू मुस्लिम एंगल कुछ ज्यादा ही मुखर होकर दिख रहे हैं। चूंकि दिख रहा है, इसलिए हरा रहा है।

जाति संबंधी टीका टिप्पणियाँ तिग्मांशु धूलिया और डिनो मोरिया से बुलवाई गई हैं, लेकिन ऐसा नहीं है कि आपके समाज में यह सोच और इस तरह की टिप्पणी बातचीत का हिस्सा होता ही नहीं हैं। दरअसल, दलित समाज का अपमान यह नहीं होता है कि यह फिल्म में ऐसा बुलवा दिया गया है, बल्कि ऐसा होता है कि आज भी ऐसा सोचा और कहा जाता है। इसी संस्कारी समाज में, आज भी बाइक खरीदने पर दलित युवक को प्रताड़ित कर दिया गया है। और, जातिगत सरनेम न होने पर घुमा फिराकर (कभी कभी बिल्कुल पर) जात पूछी जाती है। गोया, जात न हुई ‘हाथ सैनिटरीज़ कर रहे थे?’ पूछा जा रहा है। तो शिकायत किस बात से है, जो जैसा वैसा बोल दिया जा रहा है या कि जो है, उसके होने पर!

खैर, कुल मिलाकर विरोध की जमीन फिल्म की ऐसी बातों ने दी है। कुछ दिन चर्चाएँ ही बनी रहेंगी। आपने नहीं देखा है और समय का विशेष अभाव नहीं है तो ‘मेलोडी खाओ खुद जान जाओ’।



LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Must Read