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पूरी एक परंपरा है, तो लास्ट टाइम आपने कब खाई थी? – News18 हिंदी


(विवेक कुमार पांडेय)

पूरी (पुरी) का नाम आते ही मुंह में पानी आ जाता है। पूरी तरह, साथ ही चटपटी आलू की रस्से वाली सब्जी और जलेबी का काम्बिनेशन को हर भारतीय का पसंदीदा सब्जी ही है। तो आज पूरी-सब्जी की बात करेंगे। देश के हर कोने में अलग-अलग नाम से पूरी खाई चली जाती है। तो आपको सबसे पहले बता दूं कि पूरी-सब्जी या पूरी-भाजी एक भारतीय खाना (इंडियन फूड) है। शास्त्रों में भी इसका जिक्र मिलता है। शादी हो या बर्थ-डे, लंच या डिनर पार्टी बिना पूरी के तो दावत ही नहीं हो सकती। अलग-अगल स्थानों पर पूरी तरह से अलग तरीके से बनाई जाती है और इसके आधार पर उनका नाम भी बदल जाता है।

इतिहास
पूरी तरह से एक पारंपरिक भारतीय भोजन है और इसकी अजीन भारत में ही हुआ था। भारत में पक्की रसोई का यह सबसे ज्यादा जाने वाला खाना है। पूजा-पाठ में प्रसाद के तौर पर भी पूरी परोसी जाती है। संस्कृत के पूरिका शब्द से पूरा नाम निकला है।

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बहुत तरह से
पूरी बनाने में बहुत से प्रयोग होते हैं। अजवायन डाल कर, पलक डाल कर या फिर इसके अंदर कुछ भर कर। आमतौर पर शाकाहारी भोजन के तौर पर इसे परोसा जाता है। सूखी सब्जी या फिर गीली-रस वाली, सभी के साथ यह उत्सर्जित होती है। साँप आदि में भी पूरी तरह से पसंद की जाती है।

साइज
अलग-अलग क्षेत्रों में पूरी की साइज भी अलग-अलग होती है। उत्तर भारत में पूरी तरह से आकार की होती है। लेकिन, गुजरात और बंगाल सहित कुछ क्षेत्रों में यह काफी छोटी-छोटी बनती है। वहीं बिहार-यूपी के भोजपुर इलाके में इसका साइज बड़ा है। बलिया की पूरी की आप कल्पना भी नहीं कर सकते इतना बड़ा होता है। इसके आकार के आधार पर ही इसे हाथी कान पूरी कहा जाता है।

नाम
कहीं इसे पूरी तरह कहते हैं तो कहीं पर पूड़ी। इसके साथ ही बंगाल में इसे लुची के नाम से जाना जाता है। दक्षिण भारत में यह अलग नाम से जाना जाता है। साथ ही थोड़ा अलग तरीके से बनाने पर उत्तरथ भारत में बेडमी भी होती है। बाकी सेव-पूरी और पानी पूरी को तो आप जानते ही हैं। मूल में यह एक ही परिवार के सदस्य हैं।

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परंपरा
हरिद्वार या बनारस में गंगा स्नान करने के बाद पूरी तरह से खाने की परंपरा है। दोनों स्थानों पर देखा जा सकता है कि लोग गंगा स्नान करके निकलते हैं और उसके बाद पूरी की दुकानों पर कतारें लग जाती हैं। यहां पर पूरी आलू की सब्जी के साथ परोसी जाती है और साथ में जलेबी भी होती है। यह पूरी तरह से सात्विक भोजन होता है। इसमें लहसून-प्याज का इस्तेमाल नहीं होता है।



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