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पुस्तक की समीक्षा: जीवन में आगे बढ़ना है तो मछलियों को सीखना होगा उड़ना- News18 हिंदी


कोई रचनाकार की छिटपुट कविताएँ पढ़कर जो धारणा बनती है, वह उनकी कविताओं के संग्रह को पढ़कर बदल सकती है। यह बात नीरज नीर की कविताओं के संग्रह ‘पीठ पर रोशनी’ पढ़ने के बाद महसूस की। रांची के नीरज नीर को व्यक्तिगत स्तर पर पहले पता नहीं था। हालांकि किसी कवि की रचनाओं को समझने के लिए कई बार यह आवश्यक होता है कि आप उसके निजी और सामाजिक परिवेश से परिचित हों। पर यह सुखद है कि ‘बैक पर रोशनी’ संग्रह की कविताओं ने नीरज नीर के व्यक्तित्व से परिचय प्रदान का काम बड़ी सरलता किया है। और यह किसी भी रचनाकार के लिए सम्मान की बात होती है कि उसकी रचना लेख से उसका परिचय कराए, कोई राय बनाए।

प्रलेक प्रकाशन से आए नीरज नीर के इस संग्रह में कुल 66 कविताएँ हैं। आवरण कवियों के अनुकूल है और आभाव करता है। नीर ने अपनी कविताओं को पांच खंडों में बांटा है। ये खंड हैं – आग, जल, वायु, आकाश और क्षितिज। इन खंडों की कविताओं को पढ़ते हुए आपको इनकी निष्पक्षता दिखती है। मसलन, क्षितिज की कविताओं में आपको तमाम विषय एकाकार होते दिखेंगे। क्षितिज के तहत दर्ज कविताएं आपको ध्यान दिलाती हैं कि यह समाज कई बार मूल मुद्दों से भटककर किसी और बहस में उलझ जाता है। और तिसपर दुखद यह कि मूल मुद्दा कहां गुम हो गया और नकली मुद्दा कब मुख्य बहस में आ गया – इसपर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।

इस संग्रह में कई कविताओं के साथ उन्हें रचे जाने की तारीख भी दी गई है। क्वेरी के दौरान में इन तारीखों को क्रम देने के बजाए विषय और विचार को तरतीब दिया गया है। इससे कवि की विचार श्रृंखला की कड़ी मजबूत दिखती है। इस संग्रह में पहली कविता स्त्री और मानवता के पक्ष में खड़ी ‘सभ्यता का अंत’ है। कवि का मानना ​​है कि सभ्यताएं तब मरनी शुरू होती हैं जब हम स्त्रियाँ और मानवता को कुचलना शुरू करते हैं। इसलिए चाहे मरी हुई नसबंदी हो या विलुप्त हो गई सभ्यता, उसकी मिट्टी और उसके द्वार पर किसी स्त्री की चीख हमें सुनाई देती रहेगी, उसकी जली हुई धातु हमें मिलेगी, उसका चीथड़ा अस्तित्व हमें मिलेगा। यह कविता 14 दिसंबर 2019 को रांची गई है। लेकिन इसके ठीक बाद दूसरी कविता 20 मार्च 2018 को रांची गई है। यानी अपने रचे जाने के क्रम में वह पहले है, पर संग्रह में उसे जगह बाद में मिला है। अंधविश्वास पर करारा प्रहार करती इस कविता का शीर्षक ‘ईश्वर’ है। कहा जा सकता है कि कवि के लिए सभ्यता ज्यादा जरूरी है, सभ्यता को रचनेवाली स्त्री ज्यादा जरूरी है, बनिस्बत ईश्वर। ‘ईश्वर’ कविता में नीर लिखते हैं –

दुकानदार की चतुराई और ग्राहक के भोलेपन पर
निर्भर करता है ईश्वर का शक्तिशाली होना
इन दुकानों में जाने की पहली शर्त है
अंधत्व
आंख वालों को रखा जाता है दूर
वीरेन्द्र तेरकर …

इस संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए महसूस होता है कि कवि की निगाह में झारखंड की संस्कृति और सम्मान, परंपरा और पहचान, विस्थापन और सवाल – सब हैं। इन मुद्दों पर वह अपनी कविताओं में बहस करता है और कई बार किसी नतीजे तक अपने लेख को ले जाता है। नीर की एक ऐसी ही कविता है ‘विस्थापन -2’। इस कविता में वर्तमान स्थिति से बाहर निकलने की छटपटाहट दिखती है। वह लेख को बतलाते हैं कि जरूरत पड़ गई तो अपनी मूल प्रकृति छोड़ कर नई प्रकृति विकसित करें। खुद को आगे से आगे बढ़कर ढालने की एक जिद का समर्थक दिखता है रचनाकार। वह लिखते हैं –

मछलियाँ बेचैन हैं,
जीवित रहने के लिए
मछलियों को सीखना होगा उड़ना …

मछलियों को प्रतीक बनाकर लिखी गई इस कविता में कवि ने बताया है कि मछलियों की समस्याएं बड़ी हैं। उन्हें बगुलों से शिकायत नहीं रह गई, क्योंकि उन्होंने सहजीविता सीख ली है। मछलियों को विशाल हाथियों से भी खतरा है जो पानी में उतर आए हैं विकास और प्रगति का बैनर लिए हैं। इसलिए तो मछलियों मानती है कि विकास उनके लिए विनाश है।

‘किसान की उम्र’ शीर्षक से लिखी गई कविता बहुत ही सहजता से असमय बूढ़ा हो रही किसान के जीवन के संताप को उजागर करती है। ‘जंगल का विकास वाया सड़क’ जैसी कविताओं आदिवासी समाज के संकट का प्रतिनिधित्व करती हैं। रचनाकार ने स्वीकार किया कि आदिवासी क्षेत्रों के जंगल बड़े तेजी से खराब हो गए हैं। उनके खराब होने का पता किसी को नहीं चला। सबने उसे बेहतरी की तरह देखा। और बाद में यह बात समझ में आई कि हमारी हरियाली लुट चुकी है और जिसे हम जीवन की हरियाली समझ रहे हैं दरअसल वह उजाड़ होने की शुरुआत हो रही है। आदिवासी समाज के इस भोलेपन के दोहन को उजागर करते हुए नीर लिखते हैं –

किसी ने नहीं देखा
जंगल के पैर, पंख उग आए
। अब वहाँ जंगल नहीं है
न जाने किसी अदृश्य दिशा की ओर
जंगल, कर विदा हो गया
बिना किसी शराब के
हिल हुज्जत के …

जंगल के पीछे-पीछे गायब हो गए
शांत हो गया
जीव-जंतु, कुएं का पानी
गीत और गदर भी …

अब वहां उगते हैं
पेड़ों से भी गहरी जड़ें उखड़ जाती हैं
कारखाने, खदान और बड़े-बड़े भवन …

इस संग्रह का नाम जिस कविता से लिया गया है वह झारखंडंडीज़ के सर्वहारा वर्ग की चिंता करती हुई कविता है। नीर की यह कविता संकेत करती है कि झारखंड की खनिज संपदा से ही देश के दूसरे इलाके रोशन हैं। यहां के कॉक खदानों से आने वाला राजस्व देश के विकास को स्वर देता है, बावजूद क्षेत्र में विकास का सूरज उगता नहीं है, बल्कि केक खदानों में डूब जाता है। देश को रोशन करने का जिम्मा हमें सौंपा गया है, हमारी ही पीठ पर रोशनी रखी गई है, पर दीया तले अंधेरा होता है सो हमारे चेहरे के अंधेरे में हैं। इसी कविता में इलाके की बदहाली को लेकर कवि का दर्द छलकता है और वह कहती है कि –

हम एक मुल्क में रहकर भी
रहते हैं अलग-अलग मुल्क में

कहना होगा कि यह हालिया साहित्यिक समाज में भी है। यहाँ भी अलग-अलग मठाधीशी है। कोई इस मठ का तो कोई उस मठ का, जो रचनाकार इन मठों से दूर अपना कुछ अलग रच रहा है, उसके सामने पहचान का संकट है। यह झारखंड जैसे प्रदेश के कई बुजुर्ग और युवा रचनाकार झेलने को अभिशप्त हैं। लेकिन उम्मीद जगती है कि पीठ पर जो रोशनी के बारे में नीरज नीर चले गए हैं, उसका उजाला गीत से ही सही पर उन्हें रोशन जरूर करेगा।

संग्रह: पीठ पर रोशनी
कवि: नीरज नीर
प्रकाशक: प्रलेक प्रकाशन
मूल्य: 200 रु



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