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पुस्तक अंश: भारत के विभाजन की तीन दशक में बिखरी कहानी और महात्मा गांधी की अपौरुषेय भूमिका- News18 हिंदी


किताब ‘गांधी हार गई?’ में लेखक दुर्गेश पाण्डेय ने आज़ादी की लड़ाई में महात्मा गांधी की भूमिका, उनकी नीतियों, जिन्ना और मुस्लिम लीग, कांग्रेस की भूमिका और अहिंसा व हिंसा के दर्शन के बीच कशमकश की सामाजिक-राजनैतिक प्रतीकों को खूबसूरती के साथ बरकरार रखा है। साथ ही, किताब में गांधी जी के भाषण के कुछ अंशों का जिक्र भी है, जिनके माध्यम से चीजों का सही खाका खींचने की कोशिश की गई है। पेश हैं इस पुस्तक के चुनिंदा अंश:

इतवार का दिन था … घर के सभी सदस्य आलस भाव में बातचीत कर रहे थे। धर्मपत्नी जी विशेष स्न की तैयारी कर रहे थे। उधर टीवी पर भारत-चीन विवाद की खबरें दिख रही थीं। ऐसा लग रहा था कि पिछली रात को भारत-चीन सीमा विवाद पर कोई विशेष बात नहीं हुई है। टीवी चल रहा था तो ज़रूर था, लेकिन उसे कोई तवज्जो नहीं दे रहा था। इसी तरह मेरे बड़े बिटिया स्वर ने बाबा से कहा कि “… ……। अगर भारत का बंटवारा नहीं हुआ होता तो आज भारत कितना मजबूत होता और चीन की यह हिम्मत नहीं पड़ती कि वह भारत से लड़ाई करे …।”

बाबा ने लम्बी सांस लेते हुए और चेहरे पर मुस्कान लाते हुए उत्तर दिया कि काश! ऐसा हो पाता है। फिर बिटिया ने निर्मल मन से यह सवाल हवा में उछाल दिया कि बाबा भारत के बंटवारे का जिम्मेदार कौन है? इतने में बेटे अर्जुन ने कहा कि भारत के बंटवारे के लिए जिन्ना ही तो जिम्मेदार हैं। उसी के कारण देश का विभाजन हुआ था। बाबा ने सभी बच्चों को समझाते हुए यह कहा कि कहानी बच्चों यह कहानी इतनी आसान और सीधी नहीं है। ”केवल सबसे छोटी बिटिया अदिति ने कहा कि बाबा“ क्या आप हमें बंटवारे की कहानी बता सकते हैं? ”बच्चों ने भारत पाकिस्तान की बंटवारे की। में जिन्ना की भूमिका के संबंध में बताने के लिए जिद्द की।

व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के काल में और सोशल मीडिया पर विभिन्न प्रकार के झूठे तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं। ऐसे में बच्चों के मन में देश के विभाजन की कहानी जानने की उत्सुकता से मन प्रसन्न हो गया, लेकिन यह आशंका भी क्या बच्चे की किसी विषय के बारे में वास्तव में जानना चाहते थे?

बाबा: “क्या सच में आप लोग कहानी सुनना चाहते हैं?”
सभी बच्चों ने एक स्वर में कहा: हाँ।

बाबा ने लंबी साँस लेते हुए कहा: काश भारत का विभाजन नहीं हुआ, तो शायद भारत विश्व का सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देश होता है। भारत की सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान तक फैली होती हैं। बाबा ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि वर्ष 1937, अक्टूबर महीने की बात है। जिन्ना मुस्लिम लीग के अधिवेशन में शामिल होने लखनऊ आए थे। उससे पहले 1937 में हुए चुनावों में कांग्रेस को भारी जीत मिली थी। मुस्लिम लीग को हार प्राप्त हुआ था। मुस्लिम लीग का मनोबल गिरा हुआ था। ऐसे में मुस्लिम लोगों को केवल जिन्ना से ही उम्मीद थी।

जिन्ना ने तकरीर करते हुए कहा “… मुस्लिम लीग का यह सत्र सबसे महत्वपूर्ण सत्रों में से एक है। मुसलमानों को निराशा होने की आवश्यकता नहीं है। यह समय एकजुट होने का है। मुस्लिम लीग ने चुनावों में उम्मीद से बेहतर परिणामजे दिए हैं। लीग को कोने-कोने तक पहुंचाने का कार्य कोई आसान नहीं था। मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के आर्थिक उत्थान के साथ उन्हें राजनीतिक आवाज देने के लिए बहुत बेहतर काम किया है। usust होने की कोई जरूरत नहीं है। सुदूर कोने से लेकर। पश्चिम सीमा सूबे तक लगभग हर जगह लीग स्थापित हो चुकी है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है … “

जिन्ना ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा “… कांग्रेस का नेतृत्व विशेष रूप से पिछले 10 वर्षों के दौरान हिंदू नीति का एक कर रहा है। इसमें किसी भी मुस्लिम के प्रति न्याय व ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जा सकती है। ।। “

जिन्ना ने कांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि “… उनकी यह मांग है कि लीक को खत्म कर दो और अपनी नीति और कार्यक्रम को भी खत्म कर दो। क्या हम ऐसा कर सकते हैं? हरगिज नहीं …”

जिन्ना ने मुसलमानों को ललकारते हुए कहा “… इसके पहले कि बहुत देर हो जाए मुसलमानों को अपना रास्ता चुन लेना चाहिए। मैंने पहले भी बताया कि मुसलमानों का एक वर्ग विभाजित है। एक समूह है जो अंग्रेजों की ओर और दूसरे समूह कांग्रेस है। की ओर मुंह करके खड़ा है। ये इसलिए ऐसा करते हैं क्योंकि उन्होंने खुद पर विश्वास खो दिया है। मैं चाहता हूं कि मुस्लिम अपने भाग्य को अपने हाथ में लें और अपने पर भरोसा करें। हम ऐसे मुस्लिम चाहते हैं जो एक हों। बहुसंख्यक समुदाय। के साथ कोई समझौता संभव नहीं है क्योंकि कोई भी हिंदू नेता किसी भी अधिकार के साथ बात नहीं करता है। कमजोर पक्ष द्वारा शांति का प्रस्ताव हमेशा कमजोरी की निशानी है और आक्रामक को खुली दावत है। कांग्रेस हाईकमान अलग-अलग शब्दों में बात करता है। ; हिंदू-मुस्लिम प्रश्न जैसी कोई चीज नहीं है। मिनक प्रश्न जैसी कोई चीज नहीं है। मैं चाहता हूं कि मुस्लिम अपनी स्थिति पर विचार करें और अपने भाग्य का फैसला स्वयं करें। मुस्लिम लीग निश्चित रूप से मुसलमानों के अधिकारों और नीतियों की रक्षा के। खड़ी है। मुसलमानों के साथ संबंध स्थापित करने की आड़ में कांग्रेस का प अस मुसलमानों को विभाजित और कमजोर करने का है। ये खतरनाक कदम है। हमें गुमराह नहीं कर सकते। भारत के मुसलमानों को डराने की ज़रूरत नहीं है। अगर आप एकजुट रहेंगे तो मुझे विश्वास है कि सफलता हमारे साथ होगी … “

इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारत में दुनिया की लगभग हर जाति-मजहब के लोग आए, रहे और रहे। इसमें सभी जाति और मजहब के लोगों ने घुल-मिलकर एक सांस्कृतिक एकता की नई धारा बनाई। हमारी इस भारतीयता को अंग्रेजों ने कभी स्वीकार नहीं किया था कि उन्होंने अपनी सुविधा के लिए फूट डालो और शासन करो की नीति अपनाई।

बाबा: बच्चों, “हमें इस कहानी को समझने के लिए फ्लैश बैक यानि पीछे जाना पड़ेगा।” ..

सन 1930 में मुस्लिम लीग के इलाहाबाद अधिवेशन की शीर्ष करते हुए उर्दू कवि इकबाल ने कहा कि उत्तर पश्चिम भारत के क्षेत्रों को मिलाकर एक मुस्लिम राज्य के रूप में निर्माण ही मुसलमानों की अंतिम नियति प्रतीत होता है। मुसलमानों के लिए अलग राज्य मुस्लिम राज्य ’के निर्माण के संबंध में अपने विचार रखे। ‘इलाहाबाद’ ही वह स्थान है जहां पर सर्वप्रथम अलग मुस्लिम राज्य / राष्ट्र की कल्पना इकबाल ने की थी। इकबाल के भाषण में ‘पाकिस्तान’ नाम का जिक्र तो नहीं हुआ था लेकिन उन्होंने अलग देश बनाने की भूमिका तैयार कर दी थी। इसलिए आज पाकिस्तान में इकबाल का वही स्थान है जो जिन्ना का है। ये वही इकबाल हैं जिन्होंने सारा जहां से अच्छी कविता लिखी थी, लेकिन बाद में पाकिस्तान के निर्माण में महती भूमिका निभाई।

अनुग्रह: “बाबा हमें जरा जिन्ना के बारे में विस्तार से बताईए।”

बाबा: हाँ बेटा, यह बात बहुत कम लोग जानते हैं कि भारत के बंटवारे और लाखों लोगों की मौत और अनगिनत को बेगर करने का दोषी महसूसना प्रारंभ से सम्प्रदायवादी और कट्टरपंथी नहीं जान पड़ते थे।

प्रारंभ में जिन्ना का जीवन आधुनिक प्रगतिशील जैसा था। यह माना जाता है कि जिन्ना ना तो नमाजी थे और ना ही धार्मिक आयामता के दायरे में थे। वे ना तो दाढ़ी रखते थे और ना ही रोजे रखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे रमजान के पवित्र दिनों में भी सिग्री और शराब का आनंद लेते रहते थे। वे उर्दू भाषा और इस्लामी साहित्य से भी परिचित नहीं थे। प्रारंभ में जिन्ना ने मुसलमानों के धार्मिक नेता आगा खान के विचारों का भी समर्थन नहीं किया था और तेज बहादुर सप्रू से कहा था कि यदि आप अपने पुराने पंथी, पंडितों और पुरोहितों को नष्ट कर दें और हम अपने मुल्लों और मौलानाओं को नष्ट कर दें तो। हिंदू-मुस्लिम समस्या का समाधान हो जाएगा।

इन प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों के बाद जवाहरलाल नेहरू ने एक खेल दिया कि देश में केवल दो ही ताकतें हैं। ब्रिटिश सरकार और कांग्रेस। कांग्रेस के खिलाफ वोट देने का मतलब है ब्रिटिश प्रभुसत्ता स्वीकार करने के लिए वोट देना। केवल कांग्रेस ही सरकार का मुकाबला कर सकती है। कांग्रेस के विरोधियों के हित आपस में जुड़े हुए हैं। उनकी मांगों से जनता का कोई लेना-देना नहीं है। इस खेल के कारण जिन्ना जवाहरलाल नेहरू से नाराज हो गए। और उसके बाद उन्होंने नेहरू को नीचा दिखाने के लिए कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दिया। जिन्ना ने नेहरू का प्रतिवाद करते हुए कहा कि मैं कांग्रेस का साथ देने से इनकार करता हूं। देश में एक तिहाई पक्ष भी है और वह मुसलमानों का है। जिन्ना ने नेहरू और कांग्रेस को चेतावनी दी कि वे मुसलमानों को अकेले उनके हाल पर छोड़ दें।

बच्चों को अब इस कहानी में कुछ आनंद आने लगा था। उनकी उत्सुकता बढ़ रही थी। हालांकि इसकी अपेक्षा नहीं थी, क्योंकि ऐसी कहानियों को बच्चे तो क्या बड़े-बूढ़े भी पढ़ना और सुनना पसंद नहीं करते हैं।

बच्चों की जिज्ञासा ने बाबा को प्रेरित किया कि वे पूरी कहानी को विस्तारपूर्वक बताएं।
बच्चों ने बाबा से सवाल दागा कि “… क्या 1937 के बाद ही यह तय हो गया था कि पाकिस्तान बनेगा? और क्या जिन्ना ने 1937 में ही अपनी मांग के संबंध में जिद पकड़ ली थी …?”

छोटी बिटिया के सिर पर हाथ फेरते हुए बाबा ने कहा कि … 1937 के मुस्लिम लीग के अधिवेशन के बाद लगभग यह लगने लगा था कि कांग्रेस और मुस्लिम लीग की राहें सदैव के लिए जुदा हो गई हैं। लेकिन यह किसी ने भी नहीं सोचा था कि जिन्ना अपनी मांग के लिए इतनी दूर तक चली जाएगी। कांग्रेस और अन्य लोगों ने मुस्लिम लीग और जिन्ना को कम करके आंका। कांग्रेस का यह सोचना था कि सूबों के चुनावों की हार से जिन्ना और मुस्लिम लीग की राजनीति खत्म हो गई है और उनके पास वापसी करने का कोई आधार नहीं है, लेकिन शायद यह कांग्रेसी नेताओं की भूल थी।

मुस्लिम लीग का यह सत्र 22 मार्च से 24 मार्च, 1940 तक लाहौर के मिंटो पार्क, जिसे अब इकबाल पार्क के नाम से जाना जाता है, में आयोजित किया गया। द्वि-राष्ट्र सिद्धांत को मुस्लिम लीग ने लाहौर अधिवेशन में स्वीकार किया। मुस्लिम लीग ने अपनी उस सोच पर मोहर लगा दी कि हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते और वे अलग-अलग कौम यानि राष्ट्र हैं। लाहौर के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान जिन्ना ने दो कौमी नजरिये यानि द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की विस्तृत व्याख्या की, “… हिंदू और मुस्लिम दोनों के धार्मिक विचार, दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाज, साहित्य अलग-अलग हैं। वे न तो विवाह विवाह सम्बन्ध करते हैं और न ही मिलकर खाते-पीते हैं और वास्तव में वे दो अलग-अलग संपत्तियों से संबंधित हैं, जो मुख्य रूप से परस्पर विरोधी विचारों और आधार पर आधारित हैं। जीवन को लेकर उनके दृष्टिकोण अलग हैं। यह स्पष्ट है कि हिंदू और मुस्लिम इतिहास के विभिन्न स्रोतों से अपनी प्रेरणा प्राप्त करते हैं। उनके पास अलग-अलग महाकाव्य, अलग-अलग परख और अलग-अलग महाकाव्य हैं। बहुत बार एक कायक दूसरे का दुश्मन होता है और इसी तरह, अक्सर एक की जीत दूसरे की हार होती है …. “

द्वितीय विश्वयुद्ध में कांग्रेस के समर्थन के मुद्दे पर ब्रिटिश राज और कांग्रेस के मध्य बातचीत किसी मुकाम पर नहीं पहुंच पा रही थी और इसी बीच कांग्रेस सत्ता से अलग हो गई तो मुस्लिम लीग को लगा कि उसके लिए कुछ दरवाजे खुल गए हैं। इसी पृष्ठभूमि में लाहौर में ऑल इंडिया मुस्लिम लीग की तीन दिवसीय बैठक 22 मार्च से शुरू हुई। मोहम्मद अली जिन्ना ने उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि हिंदुओं और मुसलमानों में अन्तर इतना बड़ा और स्पष्ट है कि एक केंद्र सरकार के तहत उनका गठबंधन करने से बहुत होगा। उन्होंने कहा कि इस मामले में एक ही रास्ता है कि उनकी राहें अलग-अलग हों।

दूसरे दिन 23 मार्च को बंगाल के प्रधानमंत्री ए के फ़ज़लुल अधिकार ने “लाहौर संकल्प” पेश किया। संकल्प में कहा गया कि जिन क्षेत्रों में मुसलमानों की संख्या ज्यादा है, उन्हें अलग देश का निर्माण किया जाए। फ़ज़लुल हक द्वारा रखे प्रस्ताव के अनुच्छेद 1 में कहा गया कि “… .अखिल भारतीय मुस्लिम लीग के इस अधिवेशन का यह बहुत सोचा-समझा विचार है कि इस देश के लिए कोई संवैधानिक योजना तब तक प्रभावी नहीं हो सकती या मुस्लिम इस समय तक उसे नहीं कर सकते। स्वीकार नहीं कर सकते जब तक सकल रूप से आपस में सटी हुई इकाइयों को क्षेत्रों के रूप में एक नहीं कर दिया जाता है और इस तरह के आवश्यक भू-क्षेत्रीय समायोजन के बाद मुसलमानों की बहु संख्या वाले क्षेत्रों जैसे कि भारत के उत्तर पश्चिम परिक्षेत्र और पूर्वी। परिक्षेत्र को स्वायत्त और संप्रभु घटक इकाइयों वाले स्वतंत्र राज्यों के रूप में मान्यता नहीं दे दी जाती है … “

14 जुलाई के बाद ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई जिससे जनता की भावनाएं उग्र होने लगीं या यूं कहें कि जनता के सब्र का बांध टूटने की कगार पर था। उधर ब्रिटिश सरकार भी जनता के दमन की तैयारी कर रही थी। ऐसी परिस्थितियों में सरकार और जनता के बीच संघर्ष होना तय था। अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी का अधिवेशन 7 अगस्त, 1942 को बम्बई (मुम्बई) में शुरू हुआ। इस अधिवेशन में लगभग बीस से पच्चीस हजार लोग सम्मिलित हुए। कमेटी में महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित हुआ जो “भारत छोड़ो प्रस्ताव” के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रस्ताव को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने पेश किया था, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने संवेदनशीलता से पेश किया था। प्रस्ताव 8 अगस्त को भारी बहुमत से पारित हुआ। केवल 12 सदस्यों ने ही इसका विरोध किया था। मुम्बई के जिस पार्क (ग्वालिया टैंक मैदान) से यह आन्दोलन शुरू हुआ, उसे ‘अग क्रांति मैदान’ नाम दिया गया है।

प्रस्ताव पास हो जाना के बाद गांधी जी ने अपना भाषण दिया। गांधीजी के अंदर एक ऐसी शक्ति का संचार हो रहा था जिसका वर्णन शब्दों में किया जाना संभव नहीं है। ताबड़ी सीतारमैया ने अपनी पुस्तक “द हिस्ट्री ऑफ द कांग्रेस” में उल्लेख किया है कि उस दिन गांधीजीतार और पैगंबर की भविष्यवाणीक शक्ति से भाषण दे रहे थे। उनके अंदर ज्वाला धपर रही थी। गांधी जी ने उस दिन राजनीति के धरातल से ऊपर उठकर मानवता, विश्वव्यापी भाईचारे, शांति और मानव मात्र के प्रति सौभाव से परिपूर्ण होकर दिव्य ज्ञान की चर्चा की। गांधी जी ने कहा था कि मैं इस लड़ाई में आपका नेतृत्व करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर सेनापति या नियंत्रक के रूप में नहीं बल्कि, आपके तुच्छ सेवक के रूप में लेता हूं। गांधीजी ने सवाल किया कि … आखिरकार आज भारत की आज की मांग कर रही कांग्रेस ने कौन सा अपराध किया है …?

अपना भाषण समाप्त करते हुए उन्होंने कहा कि आज मैंने कांग्रेस को धार पर लगा दिया है। या तो वह या मारेगी। गांधी जी ने अपने भाषण में यह भी कहा कि यह मेरे जीवन का अंतिम संघर्ष होगा। इसी भाषण में उन्होंने “करो या मरो” का ऐतिहासिक नारा दिया था। जिसका तात्पर्य यह था कि भारतीय जनता स्वाधीनता की प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास करेगी। गांधी जी ने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि यह आन्दोलन पूर्ण रूप से अहिंसात्मक होगा और इसमें किसी भी प्रकार से हिंसा की कोई जगह नहीं होगी …
(लेखक दुर्गेश पांडे उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारी हैं। उनकी पुस्तक गये गांधी हार गई? ’के अंश)



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