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नसीर तुरबी शायरी: बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़े न था, नसीर ट्यूशन की शायरी


नसीर तुरबी मौत: मशहूर शायर नसीर तुलुशन का रविवार को पाकिस्तान के कराची में इंतकाल हो गया। कई शायरों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और नसीर तुलन के निधन को उर्दू साहित्य का बड़ा नुकसान बताया। नसीर साहब की पैदाइश निजाम के शहर हैदराबाद से थी। लेकिन भारत पाकिस्तान बंटवारे के साथ उनके पिता परिवार सहित पाकिस्तान के कराची में जाकर बस गए। नसीर साहब की आगे की तालीम कराची विश्वविद्यालय में हुई। नसीर साहब ने ऐसे कई ग़ज़लें लिखीं जो काफी मशहूर हुईं। आज हम आपके लिए रेख्ता के सभार से लाए हैं नसीर ट्यूशन की कुछ शायरी (नसीर तुरबी शायरी)और शेर …

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1। तुझे क्या ख़बर मिरे बे-ख़बर मिरा सिलसिला नं और है

जो मुझी को मुझसे से बहम करे वो गुरेज़-पा न और हैमिरे मौसमों के भी थे मिरे बर्ग-ओ-बार ही थे और थे।

लेकिन अब रविश अलग नहीं है लेकिन अब हवा नहीं और है

यही शहर शहर-ए-क़रार है तो दिल-ए-शिकस्ता की ख़ैर हो

मिरी आस कोई है और से मुझे कोई पूछता है और है

ये वो माजरा-ए-फ़िराक है जो मोहब्बतों से न खुलता है

कि मोहब्बतों में के दरमियाँ सबब-ए-जफ़ा न और है

क्या मोहब्बतों की अदायें यही हिजरतें हैं और यही क़ुर्बतें हैं

दिए गए बाम-ओ-दर किसी और ने तो बसा न और है

ये फ़ज़ा के रंग खुले खुले समान पेश-ओ-पस के सिलसिले हैं

अभी ख़ुश-नव कोई और अभी तक कु-कुशा न और है

दिल-ए-ज़ुद-रंज न कर गिला किसी गर्म ओ सर्द रक्बीब का

रुख़-ए-ना-सज़ा तो है रू-ब-रू पस-ए-न-सज़ा न और है

बहुत आया हमदम ओ-गर-जो जोमूद-ओ-नाम के हो गए हैं

जो ज़वाल-ए-ग़म का भी ग़म करे वो ख़ुश-आश्ना नो और है

ये ‘नसीर’ शाम-ए-सुपुर्दगी की उदास उदास सी रौनी

ब-कनार-ए-गुल ज़रा देखना ये तेरी हो या ना और है।

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2। वह हम-सफ़र था लेकिन वह से हम-नवि न था

उस धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न था

न अपना रंज न और न का दुख न तेरा मलाल

शब-ए-फ़िराक कभी हम ने यूँ गँवाई न थी

मोहब्बतों का सफ़र इस तरह भी गुज़रा था

शिकस्ता-दिल थे मुसाफ़िर शिकस्ता-पाया न था

अदावतें थे, तग़ाफ़ुल थे, रंजिशें थीं

बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी

बिछड़ते वक़्त उन आँखों में हमारी ग़ज़ल थी

ग़ज़ल भी वो जो किसी को अभी सुनाई न थी

पर्यत पुकार रहा था वह डूबता हुआ दिन

सदा तो आई थी लेकिन कोई दुहाई न थी

कभी ये हाल कि दोनों में यक-दिली बहुत था

कभी ये मरहला जैसे कि आश्नाई न था

अजीब होती है राह-ए-सुख़न भी देख ‘नसीर’

वहाँ भी आ गए ओपिर, जहाँ रसाई न थी।



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