HomeHealthइसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा, पढ़े क़ज़लबाश की शायरी

इसी सियाह समुंदर से नूर निकलेगा, पढ़े क़ज़लबाश की शायरी


इमाम क़ज़लबाश की शायरी (अमीर क़ज़लबाश शायरी): अमीर क़ज़लबाश शायरी की दुनिया का एक ऐसा नाम है जो किसी तर्रुफ़ का मोहताज़ नहीं है। इमाम क़ज़लबाश का पूरा नाम अमीर आग़ा क़ज़लबाश था। अमीर क़ज़लबाश दिल्ली से तालुक्क रख रहे थे। उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी लिखा। प्रेम रोग और राम तेरी गंगा मैली के गीतों के लिए उभरते क़ज़लबाश काफी प्रसिद्ध भी हुए। आज हम आपके लिए रेख्ता के साभार से लेकर हस्सिर हुए हैं इमाम क़ज़लबाश की शायरी …

१। मिरे कत्थू का नतीजा ज़रूर निकलेगा

इसी तरह सियाह समुंदर से नूर निकलेगा

गिरा दिया है तो साहिल पे इंतिज़ार न करअगर वो डूब गया है तो दूर निकलेगा

वही का शहर वही मुद्दोंदई वही मुंसिफ़

हमें यक़ीनन हमारा क़ुसूर निकलेगा था

यक़ीं न आया तो इक बात पूछ कर देखो

जो हँस रहा है वो ज़ख़्मों से चूर निकलेगा

उस कला से अश्मरों को पोछने वाले

उस शैल से ख़ंजर ज़रूर निकलेगा।

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२। नज़र में हर दुश्वारी रखना

ख़्वाबों में बेदारी रखना

दुनिया से झुक कर वोट न करें

रिश्तों में हमवारी रहती है

सोच समझ कर बातें करना

लफ़्ज़ों में तहज़ीब रखना

फ़ुटपाथों पर चैन से सो

घर में शब-बेदारी रखना

तू भी सब जैसा बन जा

बीच में दुनिया-दारी रखना

एक ख़बर है आपके लिए

दिल पत्थर पर रखने के लिए

ख़ाली हाथ निकल घर से

ज़ाद-ए-सफ़र हुशारी रखना

शेर सुना और भूका मर गया

यह ख़िदमत को जारी रखना।
३। वो सर-फिरी हवा थी सँभलना मेरे पास थी

मैं अपिरी चराग़ था जलना मेरे पास था

महसूस कर रही थी कि वह अपने आस पास है

अपना ख़याल ख़ुद ही बदल गया मुझे

सूरज ने छुपते छुपते उजागर किया था तो था

लेकिन तमाम नाईट कलंक मेरे पास था

मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू कहीं मिरी ख़ामुशी था

जो ज़हर पी चुके थे उगलना मुझे पड़ा

कुछ दूर तक तो जैसे कोई मेरे साथ था

फिर अपने साथ आप ही चल मेरे पास आए।
४। इक परिंदा अभी भी उड़ान में है

तीर हर शख़्स की कमान में है

जिस को देखो वही चुप सा है

जैसे हर शख़्स इम्तिहान में है

खो चुके हम यक़ीन जैसे शाय

अभी तक किसी गुमान में है

ज़िंदगी संग-दिल सही लेकिन

इना भी इसी चंदन में है

सर-बुलंदी नसे हो कैसे

सर-निगूँ है कि साबान में है

ख़ौफ़ ही ख़ौफ़ जते सोते

कोई आसेब इस घर में है

आसरा दिल को इक उमी का है

ये हवा कब से बादबान में है

ख़ुद को पाया न उम्र भर हमने कहा

कौन है जो हमारा ध्यान में है।



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