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अशोक वाजपेयी जन्मदिन विशेष: तीन कविताएँ | ashok वाजपेयी जन्मदिन विशेष तीन कविताएँ पूजा प्रसाद द्वारा पॉडकास्ट


दोस्तों आज अशोक वाजपेयी का जन्मदिन है। प्रतीकों और बिंबो के मार्फत प्रेम, पीड़ा, प्रतीक्षा और परिणति की गहरी संवेदनाओं को अद्भुत तरीके से शब्दों में पिरो देने वाले अशोक वाजपेयी की हर कविता अपने अंत के साथ एक शुरुआत छोड़ जाती है। आइए आज उनकी कुछ चुनिंदा कविताओं को सुनते हैं। मैं पूजा प्रसाद, न्यूज 18 हिंदी के लिए आज के पॉडकास्ट में आपका स्वागत करता हूं।

उनकी पहली कविता का शीर्षक है, थोड़ा-सा आदमी

अगर बच गया
तो वही बचेगा
हम थोड़ा-सा आदमी-

जो राउब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता,
अपने बच्चे के नंबर बढ़ाने के लिए नहीं जाता है, के घर,

जो रास्ता पर घायल हो गए सब को छोड़कर
सबसे पहले अस्पताल पहुंचाने का जतन करता है,
जो अपने सामने हुई वारदात की गग्रति देने से नहीं हिचकिचाता है

थोड़ा-सा आदमी
जो डिल खाता है पर प्रेम करने से नहीं चूकता,

जो अपनी बेटी के अच्छे फ्राक के लिए
दूसरे बच्चों को अंगवस्त्र पहनने पर मजबूर नहीं करना पड़ता है,

जो दूध में पानी मिलाने से हिचकता है,
जो अपनी चुपड़ी खाते हुए दूसरे की सूखी के बारे में सोचता है,

थोड़ा-सा आदमी
जो बूढ़ों के पास बैठने से नहीं ऊबता
जो अपने घर को चीजों का गोदाम होने से बच रहा है,

जो दुख को अर्जी में बदलने की मजबूरी पर दुखी होता है
और दुनिया को नरक बनाने देने के लिए दूसरों को ही नहीं कोसता

थोड़ा-सा आदमी
जिसे ख़बर है
वृक्ष अपनी पत्तियों से गाता है अहरह एक हरा गान,
आकाश लिखता है नक्षत्रों की झिलमिल में एक दीप्त वाक्य,
पक्षी आंगन में बिखेर जाते हैं एक अज्ञात व्याकरण

थोड़ा-सा आदमी
अगर बच गया तो
वही बचेगा।

कवि, साहित्यकार और स्तंभकार अशोक वाजपेयी के नाम कई कविता संग्रह दर्ज हैं। जैसे, शहर अब भी संभावना है, एक पतंग अनंत में, अगर ऐसा से, जो नहीं हैं, तत्पुरुष, कहीं नहीं वहीं, घास में दुबका आकाश, तिनका तिनका, उजाला एक मंदिर बनाता है। वहीं, समय से बाहर, कविता का गल्प, पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज जैसे आलोचना भी उनके नाम दर्ज हैं। उन्होंने कवि सम्मेलन, तीसरा साक्ष्य, कुमार गंधर्व, मुक्तिबोध की प्रतिनिधित्व कविताओं जैसे कई क्वेरी कार्य भी दर्ज किए हैं। पोलिश कवि तादेउष रूजेविच की कविताओं के साथ उन्होंने जीवन के बीच आस्तिक नाम से किया है। देश ही नहीं पोलिश और फ्रॉफस सरकार द्वारा भी वे सम्मानों और निबंधों से नवाजे जा चुके हैं।

उनकी वही दूसरी कविता को मैं पढ़ रहा हूँ, उसका नाम है – आप जहाँ भी कहो

तुम जहाँ भी कहो
वहाँ चले गए
दूसरे घर में
अँधेरे भविष्य में
न कहीं पहुंचने वाली ट्रेन में

अपना बसता-बोरिया उठाकर
रद्दी के बास सा
जीवन को वापस लादकर
जहाँ कहो वहाँ चले जाओगे
यह शहर वापस आ गया
यह चौगान, इस आँगन में नहीं आयेंगे

वहीं पक्षी बनेंगे, वृक्ष बनेंगे
फूल या शब्द बन जाएगा
जहाँ आप कभी खुद नहीं आना चाहोगे
वहाँ तुम कहो
चले जाएंगे

मित्रो, कवि की कविताओं के साथ आप में एक पूरा संसार होता है। ऐसी ही एक संसार अशोक वाजपेयी इस कविता के मार्फ़त रचते हैं।

कोई नहीं हार्दिक चीख

कोई नहीं हार्दिक चीख
कोई नहीं हार्दिक चीख –
सुनती है खिड़की के बाहर
हरियाली पेड़ पर अचानक आ गया नीली चिड़िया,
जिसे पता नहीं है कि यह चीख है
या कि आवाज़ों के तुमुल में से एक और आवाज़।
कोई नहीं प्रार्थना प्रार्थना –
सुनती है अपने पालने में लेटी दुधमुँही बच्ची,
जो आदिम अँधेरे से निकलकर उजाले में आने पर
इतना भौंकता है
कि उसके लिए अभी भी आवाज है
होने, न होने के बीच का सुनसान है।



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